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Thursday, August 25, 2016

सहती रहो माँ ने कहा था।

सहती रहो माँ ने कहा था।
सहती जाओगी तो धरती कहलाओगी दादी ने कहा।
फिर वो भी कभी बही सरिता बन
कभी पहाड़ हो गई कभी किसी अंकुर की माँ हो गई
पर मुँह से एक शब्द भी नहीं निकाला।






एक स्त्री से अन्य तक पहुँची यही बात
सब अपनी-अपनी जगह होती चली गई जड़वत्
बनती चली गई धरती जैसी।

हर धरती के आसपास रहा कोई चाँद
तपिश भी देता रहा कोई सूरज
तब से पूरा का पूरा
सौर मंडल साथ लिए घूमने लगी है स्त्री ।

जो अच्छी कविताएं लिखते हैं


अच्छे कवि वे होते हैं जो अच्छी कविताएं लिखते हैं
अच्छी कविताएं वे होती हैं जिनकी अच्छे कवि, 
अच्छे सम्पादक अच्छे आलोचक परम अच्छे मित्र अच्छा होने की 
उद्घोषणाएं  करते हैं

जो अच्छी पत्रिकाओं में जो अच्छे  और
ऐसे प्रतिष्ठित पत्र- पत्रिकाओं में छपें
जिन में अच्छी कविताओं के 
अच्छे कवि के बारे में
अच्छे कवि, अच्छे सम्पादक अच्छे आलोचक
परम अच्छे मित्र 
अच्छी- अच्छी विस्तार से समीक्षाएं
अच्छे- अच्छे आलोचनात्मक आलेख छपें

अच्छी पत्रिकाएं वें जिन में अच्छे कवि, 
अच्छे सम्पादक अच्छे आलोचक परम अच्छे मित्र हों 


और जो प्रतिष्ठित पुरस्कारों के पैनलों की सलेबस- कोर्स बुक हों

अच्छे - प्रतिष्ठित पुरस्कार वे जो 
अच्छे कवि, अच्छे सम्पादक
अच्छे आलोचक परम अच्छे मित्रों के 
निर्णायक मण्डल द्वारा केवल अच्छे कवि
अच्छी कविताओं को दिए जाते हैं

तो मित्रो! भले आप अच्छे कवि न हों
अच्छी कविताएं न लिख पा रहे हों
अच्छे कवि, अच्छे सम्पादक
अच्छे आलोचक परम अच्छे मित्र बनाइए
और अच्छी कविताओं के अच्छे कवि होने की
जारी की जानेवाली सूचियों में
जितनी जल्दी हो सके अपने को नामज़द करें!


तुम तालियां बजाना


जब मैं कुछ कहूं- तुम तालियां बजाना, बजवाना
जब तुम कुछ कहोगे- मैं तालियां बजाऊंगा, बजवाऊंगा
तुम मुझ से यूं ही निभाते रहनामैं तुम से यूं ही निभाता रहूंगा.....

मेरे बेसुरों पर तुम ताल ठोंकना तुम्हारे बेसुरों पर मैं ताल ठोंकूंगा
मेरी असंगत को तुम संगत देते रहना
तुम्हारी असंगत को मैं संगत देता रहूंगा......

याद रहे! गीत हमें, अपने- अपनों ही के गाने हैं
अकेला चना भाड़ नहीं झौंक सकता, सबके यहां घराने है
तुम मुझे दरबार भिजवाते रहना मैं तुम्हें दरबार भिजवाता रहूंगा।


मुख-पृष्ठ कोमुख-पृष्ठ बनाते हैं....


बहुत से मुखपृष्ठ हाशियो से घबराते हैं
मुखपृष्ठी अपने दंभ में हाशिये ही नहीं लगाते हैं
जहां कहीं दिखायी देने लगते हैं हाशिए
उन्हें हटाने,मिटाने की जुगत में लग जाते हैं
उन्हें कौन समझाए हाशिए ही तो..... 
मुख-पृष्ठ कोमुख-पृष्ठ बनाते हैं


कहां खड़ा रहूं जहां भी दिखती है ज़मीन .....

कहां खड़ा रहूं जहां भी दिखती है ज़मीन 
अपने खड़े रहने माफिक करता हूं जतन
कदमों को टिकाने की

पर जानते ही खोखलापन-हकीकतें
ज़मीन कीकांपने लगते हैं कदम
टूट जाते हैं सारे स्वप्न
अपने पैरों पर खड़े होने के

सच!अब सचमुच ही होगा कठिन
खड़े रह पाना अपनी ज़मीन पर
बची ही कहां और कितनी
एक अदद आदमी के खड़े रहने के लिए 
एक अददठोस ज़मीन...


ऐसे डसता है कि सांप भी.......


सांप को 
सब जानते, पहचानते हैं
सांप है
उस में जहर है
सब बचते हैं
सांप 
खुद डरते हैं
सब से बचते हैं
कभी 
चलाकर नहीं डसते
आदमी तो
सांप का भी बाप है
सारी जान- पहचान धरी रह जाती है
इतना चुपचाप
इतने प्रेम से
ऐसे डसता है कि सांप भी.......


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